
अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका कवितावली में प्रकाशित डॉ. संतोष गर्ग की स्वयं रचित कविताएं













































व्यक्तिगत पृष्ठभूमि को लेकर कुछ सवाल
-आपके परिवार की पृष्ठभूमि क्या रही है और क्या आपके परिवार में आपको बचपन से ही साहित्यिक माहौल मिला?
उत्तर – ऐसा है पाल जी! मैं एक संयुक्त परिवार में पली बड़ी हूं। मेरे पिताजी, दादा-दादी की इकलौती संतान थे। हमारी दादी के 16 बच्चे हुए लेकिन उनमें से सिर्फ पिता जी ही बचे थे। उनको भी किसी ने पाला था। इसी कारण से उनका नाम भी श्री रूलदू राम सिंगला रहा है। मेरी मां का नाम श्रीमती देवकी देवी है।
हमारे घर में एक पिताजी की चाची (श्रीमती वीरो देवी) और मेरी सगी दादी(श्रीमती लक्ष्मी देवी) थीं। हम उन दोनों को छोटी मां और बड़ी मां कहते थे। हमारे परिवार में मेरी दो दादी, दादा जी (श्री इन्द्र मल), पिताजी और फिर अकेले पिताजी के हम सात बहन- भाई थे। ऐसे हमारा भरा पूरा परिवार था। घर में तीन पशु होते थे, दो भैंस और एक गाय। हमारे बचपन में घर ढ़ाई हज़ार गज जगह में था। बहुत बड़ा था और घर में दूध, दही, मक्खन, मलाई हमने खूब देखा है और घर में जो लस्सी होती थी उसको सभी पड़ोसी लेने के लिए आते थे और जैसा कि मैंने अपनी मां व दादी को काम करते देखा उन्हें देखकर मुझे भी चरखे पर सूत कातना, उसको रंग देना और फिर दरी बनाना सभी काम आते हैं। कैसे चारपाइयां बनती हैं, दूध कैसे बिलोया जाता है और उसका घी कैसे बनता है तो मुझे यह सारे काम अभी आते हैं।
मेरी शादी 17 साल की उम्र में हो गई थी। शादी से पहले मैंने सिर्फ 11वीं कक्षा जिसे उस समय प्रैप कहते थे, पास की थी और बाकी की जो पढ़ाई थी वह मैंने शादी की बाद की।
कुल मिलाकर
बचपन ठाट-बाट से बीता। उस समय लड़की की सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता नहीं होती थी। हम सभी मिलकर इकट्ठे खेलते थे और हमारे खेल सटैप्पू , लुक्कम छिपी, कोटला- छुपाकी, कंचे, इमली के बीजों के साथ चौपड़ आदि खेल हम खूब खेलते थे और आज की भांति जैसे बच्चे मम्मी पापा से चिपके रहते हैं हमने ऐसा कुछ नहीं देखा। हम दादा-दादी के पास ही रहते थे वही हमारा ध्यान रखते थे।
बचपन में मुझे साहित्यिक माहौल तो नहीं मिला लेकिन मैं मंचों पर गीत बोलती थी। 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले बड़े कार्यक्रमों में भाग लेती थीं।
-आपकी साहित्य की किस विधा के प्रति रुचि कैसे और कब हुई और कब पहली रचना लिखी और सार्वजनिक हुई?
उत्तर -हमारे घर में नभछोर दैनिक संध्या समाचार पत्र आता था।
उसमें कविताओं को देखकर मैंने भी नीले रंग के अंतर्देशीय खत लिखने वाले लिफाफे में दो कविताएं लिखकर संपादक महोदय को भेजी थी और सौभाग्यवश उसमें मेरी पहली दो कविताएं ‘जुदाई’ व ‘शोर’ 1988 में प्रकाशित हुईं। तब मैंने पहली बार कविता लिखना आरंभ किया था और उसके बाद मेरी बहुत सारी कविताएं प्रकाशित हुईं और उनकी कटिंग मेरे पास अब तक भी सुरक्षित है।
मैंने कुछ कहानियां भी लिखीं। 1988 में ही मेरी पहली कहानी ‘पांच रुपए’ प्रकाशित हुई थी।
-आपके साहित्यिक सफर में कुछ दिलचस्प या कुछ परेशानियां जैसे मोड़ आए हैं?
उत्तर – मेरे साहित्यिक सफर में आरंभ के दिनों में एक छोटी सी घटना बताती हूं। जब हमने एक अपनी साहित्यिक संस्था बनाई तो मैं उसमें सचिव थी।
जिस दिन पहला कार्यक्रम हुआ उस दिन मंच पर जितनी भी गतिविधियां हुईं उसमें (तब मुझे मालूम नहीं होता था) नियमों के अनुसार अध्यक्ष महोदय प्रत्येक फोटो में मंच पर थे। मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि जो तैयारी की थी पूरे कार्यक्रम की, वह हम सभी ने मिलकर की थी तो मैंने उन्हें कहा कि यह कौन सा तरीका है, काम तो हम सभी ने मिलकर किया है और फोटो खिंचवाने के समय सिर्फ आप मंच पर खड़े हो, हम ऐसे काम नहीं करेंगे।’ मैंने तुरंत वह संस्था छोड़ दी।
बाकी साहित्यिक सफर में परेशानियां तो सभी को आती हैं। मेरे सामने भी बहुत सी चुनौतियां थी। बच्चे छोटे थे उनके भविष्य के कारण उन्हें पढ़ाना भी मेरी जिम्मेदारी थी और मेरी सास मां का मन भी मेरे पास ही लगता था। उनका भी मुझे ध्यान रखना जरूरी था। एक बार वह कोमा में आ गई थी तब भी उनकी सेवा के साथ- साथ लैट्रिन तक उठानी, वह भी मेरा ही सौभाग्य था और वह मेरी कम उम्र होने के कारण मुझे घर से बाहर भी निकलने नहीं देती थी और मैं चोरी-छिपे थोड़ा झूठ बोल कर साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेती थी।
-आपकी साहित्यिक रचनाओं का फोकस किन मुद्दों पर रहा?
उत्तर – मैंने ज्यादातर प्रेम, प्यार, विरहा, अध्यात्म, सेवा, संस्कारों व राष्ट्र हित रचनाएं लिखी हैं। मैं पारिवारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक विषयों पर लिखती हूं, राजनीति पर बहुत कम लिखा है।
मेरी कुल 19 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।
जिसमें मेरे चार काव्य संग्रह, दो लघु कथा संग्रह, एक बाल उपन्यास, एक डायरी के पन्ने, छह पुस्तकें अध्यात्म पर और पांच काव्य संकलनों का लेखन संपादन कार्य स्वयं किया है।
-क्या हरियाणवी भाषा में आपने कुछ लिखा?
हरियाणवी भाषा में मैंने कुछ रचनाएं लिखी हैं। कवि गोष्ठियों में भाग लिया पर कोई पुस्तक हरियाणवी भाषा में प्रकाशित नहीं हुई है। हां! मैं हरियाणवी भाषा अच्छे से समझ लेती हूं, बोल लेती हूं। हरियाणवी ग्रुपों से भी जुड़ी हुई हूं।
88से अब तक हिंदी भाषा में निरन्तर कवि गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों का आयोजन करवाया है और अब तक कर रही हूं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद में हरियाणा प्रांत की उपाध्यक्ष हूं और राष्ट्रीय कवि संगम में 2016 से लेकर अब तक ट्राई सिटी चंडीगढ़ के अध्यक्ष पद पर लगातार सक्रिय रही हूं। एस एस फाउंडेशन द्वारा संचालित, राष्ट्रीय संवेदनाओं को समर्पित मनांजलि मंच संस्था की संस्थापक अध्यक्ष हूं। इसमें हमने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनकी किताबें, कपड़े, त्यौहार मनाना, खाने- पीने का सामान बांटना, जो लड़कियों ने हमारे द्वारा पढ़ कर प्लस टू में एडमिशन ली, उनकी माताओं को सम्मानित करना इत्यादि बहुत काम किया है। पंजाबी भाषा मैंने बहुत सारी रचनाएं लिखी हैंऔर सांझा संकलनों में प्रकाशित भी हुई हैं।
मुझे गर्व है कि मैं हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी और अंग्रेज़ी चारों भाषाएं जानती हूं।
कुछ सवाल साहित्य के बारे में
इस आधुनिक युग में साहित्य की क्या स्थिति है और साहित्य कहां पर खड़ा है?
हम सभी जानते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है। वर्तमान में साहित्य की जो स्थिति है वह बहुत अच्छी है। जैसा कि हम देखते हैं प्रत्येक नगर में बहुत सारी संस्थाएं हैं, रचनाकार लिख रहे हैं, पढ़ रहे हैं। यदि हम सोचें कि पुस्तकों को नहीं पढ़ रहे तो अगर आजकल पढ़ने वाला काम मोबाइल पर हो रहा है तो यह तो आवश्यक नहीं कि हम पुस्तकें ही पढ़ें। गूगल पर सर्च करो तो सब कुछ मिलता है। देखिए यह एक मोबाइली युग है। यदि देखा जाए तो आपने मेरा साक्षात्कार चाहा। मैंने आपको यह सब कुछ भेजा तो कैसे भेजा, क्या पोस्ट द्वारा भेजा? ‘परिवर्तन’ यदि हम
इस शब्द को ध्यान में रखकर चलेंगे तो हम कभी नहीं कहेंगे की साहित्य की स्थिति अच्छी नहीं है। आजकल हम जब भी पढ़ते हैं तो लघुता ढूंढते हैं तो मैं तो इतना कहूंगी कि साहित्य कहां खड़ा है यह हमारी सोच अच्छी नहीं है। साहित्य बहुत उच्च स्थिति पर है। लिखना, पढ़ना, प्रकाशित होना और मीडिया द्वारा, गूगल पर सब काम अच्छा हो रहा है।
यदि हम पुरातन साहित्य से तुलना करेंगे तो इतना तो किसी के पास पढ़ने के लिए भी आजकल समय नहीं है। देखा जाए तो पहले जो ग्रंथ प्रकाशित होते थे वह हजार पन्ने तक चले जाते थे। क्या आज के समय किसी के पास वैसा ग्रंथ लिखने व पढ़ने के लिए समय है.. नहीं न? फिर हम बड़े-बड़े मंचों पर खड़े हो कर क्यों कहें कि साहित्य की स्थिति अच्छी नहीं है?
-क्या साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं? यदि हां तो इसके पीछे आप क्या
कारण मानते हैं?
साहित्य के पाठक कम नहीं बल्कि ज्यादा हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर आप देखिए कितना काम हो रहा है। भले ही लाइब्रेरियों से कम पुस्तक ली जा रही होंगी परंतु आप जो नेट पर बिक्री हो रही है उसको अनदेखा कैसे कर सकते हैं? पाठक कम हैं तो पुस्तक मेलों में भीड़ क्यों है? यदि आपको पाठक कम लगते हैं तो इसका एक ही कारण है कि आजकल सब कुछ नेट पर पढ़ने को मिलता है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सारी पुस्तकें आपकी जेब में हैं, पूरी लाइब्रेरी प्रत्येक घड़ी आपके संग- संग चलती है।
-युवा पीढ़ी की साहित्य में रुचि नहीं है। इसके पीछे क्या कारण हैं? इसका
समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर –
युवा पीढ़ी की साहित्य में रुचि नहीं है ऐसा मुझे नहीं लगता साहित्य में रुचि है मैं फिर एक ही शब्द दोहराऊंगी ‘परिवर्तन’। एक ही कारण है हम रचनाकारों को बहुत लंबी- लंबी रचनाओं से, ऐसे शब्दों से जिनके अर्थ युवा पीढ़ी को समझ ही न आए
उनसे बचना होगा।
-क्या युवाओं को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है?
यदि हो तो यह तो यह कैसे संभव है?
वैसे तो युवा वर्ग अपनी आवश्यकता अनुसार साहित्य को पढ़ते हैं।
दूसरी बात संस्कार बचपन से आते हैं यदि हमारे पास उनको शिक्षा संस्कार देने के लिए समय नहीं है, हम ही रोते बच्चे को देखकर मोबाइल पकड़ा देते हैं। वह क्या देखता है, क्यों देखता है हम नहीं जानना चाहते। उसके बड़े होने पर, जब वह पूर्ण रूप में पक जाए तब हम उसे कहें कि तुम साहित्य को पढ़ो। कैसे पढ़ेगा?
उन्हें पढ़ने को और ज्यादा प्रेरित करने के लिए प्रतियोगिताएं करवा कर उन्हें सम्मानित किया जाए।
